गुना जिला अस्पताल में मानवता शर्मसार

स्ट्रेचर के अभाव में कुर्सी पर घिसटते मरीज, पीठ पर लादकर वार्ड तक ले जाने को मजबूर परिजन

गुना जिला अस्पताल में मानवता शर्मसार
मरीज को कुर्सी पर लेकर क्रिटिकल यूनिट ले जाते परिजन।

गुना।अनंत न्यूज़

 गुना जिले से स्वास्थ्य सेवाओं की जो तस्वीर सामने आई है, उसने न केवल सरकारी दावों की पोल खोल दी है, बल्कि आधुनिक समाज में सिस्टम की संवेदनहीनता का एक भयावह चेहरा भी प्रस्तुत किया है। करोड़ों रुपये की लागत से तैयार हुए 'क्रिटिकल केयर सेंटर' और कागजों पर चमकते जिला अस्पताल की जमीनी हकीकत आज उस समय तार-तार हो गई, जब अस्पताल परिसर से दो ऐसे वीडियो वायरल हुए जिन्हें देखकर किसी भी संवेदनशील व्यक्ति की रूह कांप जाए।
शुक्रवार को सोशल मीडिया पर वायरल हुए दो अलग-अलग वीडियो ने जिला अस्पताल के प्रबंधन को कटघरे में खड़ा कर दिया है। बताया जा रहा है कि यह घटनाक्रम गुरुवार सुबह करीब 11:00 बजे का है। अस्पताल परिसर में मानवता को शर्मसार करने वाले ये दृश्य उस समय देखे गए जब अस्पताल में मरीजों की भारी भीड़ थी, लेकिन उन्हें सहायता देने वाला कोई नहीं था। अस्पताल में स्ट्रेचर और व्हीलचेयर की इस कदर किल्लत देखने को मिली कि परिजनों को स्वयं ही 'वार्ड बॉय' और 'स्ट्रेचर' की भूमिका निभानी पड़ी।

कुर्सी बनी स्ट्रेचर, घिसटते हुए वार्ड तक पहुँचा घायल
पहले वायरल वीडियो में देखा जा सकता है कि एक युवक, जो संभवत: किसी दुर्घटना में घायल हुआ था, उसे सीटी स्कैन के लिए ले जाया गया था। प्रक्रिया पूरी होने के बाद घायल को वापस वार्ड तक ले जाने के लिए परिजनों ने घंटों तक स्ट्रेचर का इंतजार किया। परिजनों का आरोप है कि उन्होंने वहां मौजूद कर्मचारियों से कई बार गुहार लगाई, लेकिन किसी ने उनकी सुध नहीं ली। अंत में, बेबस परिजनों ने अस्पताल के गलियारे में रखी एक पुरानी और टूटी हुई कुर्सी का सहारा लिया। घायल युवक को उस कुर्सी पर बैठाया गया और परिजन उसे खींचते हुए वार्ड तक ले गए। गलियारे में कुर्सी के घिसटने की आवाज मानो अस्पताल के खोखले सिस्टम पर तंज कस रही थी।

बीमार महिला को पीठ पर लादकर ले जाने की मजबूरी
वहीं, दूसरी तस्वीर और भी अधिक विचलित करने वाली है। एक अन्य बीमार महिला, जिसकी स्थिति काफी नाजुक बताई जा रही थी, उसे अस्पताल के भीतर ले जाने के लिए न तो व्हीलचेयर मिली और न ही कोई स्ट्रेचर उपलब्ध कराया गया। महिला दर्द से कराह रही थी, लेकिन सिस्टम के कान पर जूं तक नहीं रेंगी। अंतत:, महिला के एक परिजन ने उसे अपनी पीठ पर लादा और वार्ड की ओर दौड़ पड़े। यह दृश्य किसी भी सभ्य समाज के लिए लज्जा का विषय है कि एक जिला स्तर के अस्पताल में, जहाँ संभाग स्तर की सुविधाएं होने का दावा किया जाता है, वहां एक बीमार महिला को जानवर की तरह पीठ पर ढोना पड़ रहा है।

दावों और हकीकत के बीच गहरी खाई
यह विडंबना ही है कि प्रदेश सरकार स्वास्थ्य सुविधाओं को लेकर बड़े-बड़े विज्ञापनों और दावों के माध्यम से जनता को आश्वस्त करती है, लेकिन हकीकत में बुनियादी सुविधाओं का घोर अभाव है। जिला अस्पताल में करोड़ों की लागत से क्रिटिकल केयर सेंटर की स्थापना इसलिए की गई थी ताकि आपातकालीन स्थिति में मरीजों को तत्काल राहत मिल सके। परंतु यहाँ तो स्थिति यह है कि मरीज को वार्ड तक पहुँचाने के लिए प्राथमिक संसाधन तक उपलब्ध नहीं हैं। अस्पताल में वार्ड बॉय और अन्य सहायक कर्मचारियों की लंबी-चौड़ी फौज कागजों पर तैनात है, लेकिन धरातल पर वे अक्सर अपनी सीटों से नदारद मिलते हैं।

जिम्मेदारों का मौन और जनता का आक्रोश
हैरानी की बात यह है कि गुना जिला अस्पताल में इस तरह की संवेदनहीनता का यह कोई पहला मामला नहीं है। बीते एक महीने के भीतर ही यह दूसरी बड़ी घटना है जिसने अस्पताल प्रबंधन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवालिया निशान लगाए हैं। बार-बार ऐसी घटनाएं होने और सोशल मीडिया पर वीडियो वायरल होने के बावजूद जिम्मेदार अधिकारी किसी भी प्रकार की ठोस कार्रवाई करने के बजाय मौन साधे हुए हैं। अधिकारियों की यह चुप्पी लापरवाही को संरक्षण देने जैसा प्रतीत होती है। इन वीडियो के सामने आने के बाद शहर के नागरिकों और सामाजिक कार्यकतार्ओं में भारी रोष व्याप्त है। लोगों का कहना है कि यदि जिला अस्पताल की यही स्थिति रही, तो गरीब मरीजों का भगवान ही मालिक है। सवाल यह उठता है कि आखिर इन अव्यवस्थाओं का जिम्मेदार कौन है? क्या आधुनिक मशीनों और भव्य इमारतों से ही स्वास्थ्य सेवाएं सुधर जाएंगी, या फिर इसके लिए मानवीय दृष्टिकोण और जवाबदेही की भी आवश्यकता है?