परिवहन विभाग की नाक के नीचे हर साल शासन को लग रही करोड़ों की चपत , टूरिस्ट परमिट पर धड़ल्ले से चल रही हैं वीडियोकोच बसें
500 में से सिर्फ 100 के पास ही वैध परमिट, बांकी का अता-पता नहीं
अनंत न्यूज़ @गुना। जिले में परिवहन नियमों की सरेआम धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। निजी उपयोग (प्राइवेट रजिस्ट्रेशन) के लिए खरीदे गए वाहनों का धड़ल्ले से कमर्शियल उपयोग किया जा रहा है, जिससे शासन को हर साल करोड़ों रुपए के राजस्व का नुकसान हो रहा है। विडंबना यह है कि परिवहन विभाग समय-समय पर इक्का-दुक्का वाहनों पर कागजी कार्रवाई कर अपनी पीठ तो थपथपा लेता है, लेकिन धरातल पर जारी इस संगठित खेल और शासन को होने वाले भारी राजस्व घाटे की उसे रत्ती भर भी परवाह नहीं है। विभाग की यह 'इच्छाशक्ति की कमी' अवैध संचालकों के लिए ढाल बनी हुई है। वहीं वीडियोकोच बसों को भी टूरिस्ट परमिट के नाम पर नियमित सवारियों के लिए चलाया जा रहा है।
शहर का जज्जी बस स्टैंड निजी वाहनों का मुख्य केंद्र बन चुका है। एक अनुमान के मुताबिक, यहाँ लगभग 500 चार पहिया वाहन अवैध टैक्सी के रूप में संचालित हो रहे हैं, जिनमें से मात्र 100 वाहनों के पास ही वैध टैक्सी परमिट है। शेष 400 वाहन निजी कोटे के हैं, जो नियमों के विरुद्ध दूसरे जिलों और राज्यों तक धड़ल्ले से सवारी ढो रहे हैं। इन निजी वाहनों के संचालक न तो कमर्शियल टैक्स भर रहे हैं और न ही फिटनेस नियमों का पालन कर रहे हैं। परिवहन विभाग की सुस्ती के चलते शासन की तिजोरी को सीधे तौर पर लाखों की चपत लग रही है, लेकिन जिम्मेदार अधिकारी केवल औपचारिकता निभाकर शांत बैठे हैं। गौरतलब है कि हाल ही में प्रदेश सरकार ने नई परिवहन नीति लागू करने का प्रयास किया था, जिसे बस मालिकों के भारी विरोध के बाद फिलहाल ठंडे बस्ते में डाल दिया गया है। बताया गया है कि अब परिवहन नीति की दोबारा समीक्षा की जाएगी। इस नीति को लेकर बस मालिकों ने सुनियोजित योजना अपनाई थी और ठीक होली के त्यौहार से पहले हड़ताल का ऐलान कर सरकार को मुश्किल में डाल दिया था। कुल मिलाकर वाहन मालिक सरकार की नीति का तो विरोध कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर परिवहन नियमों का भी उल्लंघन किया जाता है, जिस पर विभाग का ही ध्यान नहीं है।
सरकारी विभागों में भी निजी वाहनों की भरमार
नियमों की अनदेखी का आलम यह है कि खुद सरकारी विभागों में निजी वाहन किराए पर लगे हुए हैं। बिजली कंपनी से लेकर जिला पंचायत तक में ऐसे वाहनों की भरमार है जो टैक्सी के रूप में रजिस्टर्ड नहीं हैं। नियमानुसार कमर्शियल वाहन की नंबर प्लेट पीली होनी चाहिए, जबकि सरकारी दफ्तरों में सफेद नंबर प्लेट वाले निजी वाहन धड़ल्ले से दौड़ रहे हैं। विभाग प्रमुख भी इन नियमों को जानबूझकर अनदेखा कर रहे हैं, जिससे न केवल भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिल रहा है बल्कि नियम पालन करने वाले वाहन मालिकों का हक भी मारा जा रहा है। आरटीओ कार्यालय की ओर से इन विभागों को नोटिस जारी करने तक की जहमत नहीं उठाई जा रही है।
यात्रियों की जेब पर डाका: मनमाना किराया वसूली
वैध परमिट न होने के बावजूद इन वाहन संचालकों ने किराए में भारी बढ़ोतरी कर दी है। टैक्सी का किराया दो रुपए प्रति किलोमीटर तक बढ़ा दिया गया है। उदाहरण के तौर पर, भोपाल का जो सफर पहले 4500 रुपए में होता था, उसके लिए अब यात्रियों को 5500 रुपए तक चुकाने पड़ रहे हैं। सुरक्षा और बीमा के लिहाज से भी ये निजी वाहन यात्रियों के लिए बेहद जोखिम भरे हैं। यदि इन वाहनों के साथ कोई दुर्घटना होती है, तो निजी वाहन का कमर्शियल उपयोग होने के कारण यात्रियों को बीमा क्लेम मिलना लगभग असंभव होता है। ऐसे में यात्री न केवल आर्थिक लूट का शिकार हो रहे हैं, बल्कि उनकी सुरक्षा भी भगवान भरोसे है।
क्या कहता है नियम?
परिवहन नियमों के अनुसार, यदि कोई वाहन किराए पर चलाना है तो उसका रजिस्ट्रेशन 'टैक्सी' के रूप में होना अनिवार्य है। इसके लिए निजी वाहन के टैक्स से एक प्रतिशत अधिक राशि जमा करनी होती है और वाहन पर पीली नंबर प्लेट लगाना आवश्यक है। जानकारों का कहना है कि अगर विभाग सख्ती से चेकिंग अभियान चलाए और नंबर प्लेट के आधार पर धरपकड़ करे, तो एक ही दिन में करोड़ों का राजस्व वसूला जा सकता है। लेकिन अधिकारियों की मौन सहमति के कारण यह अवैध कारोबार फल-फूल रहा है।