धन्नासेठों के रसूख तले दबी शहर की पार्किंग व्यवस्था : तलघरों में चल रहे शोरूम; प्रशासन नतमस्तक
अनंत न्यूज़ @गुना। मध्यप्रदेश के गुना शहर में यातायात व्यवस्था एक ऐसे दुष्चक्र में फंस गई है, जिससे निकलना अब आम नागरिकों के लिए किसी दु:स्वप्न से कम नहीं है। शहर के सबसे व्यस्ततम इलाकों—जयस्तंभ चौराहा से लेकर हनुमान चौराहा और निचला बाजार से सुगन चौराहे तक—पार्किंग व्यवस्था पूरी तरह ध्वस्त हो चुकी है। विडंबना यह है कि इस अव्यवस्था के पीछे शहर के तथाकथित 'धन्नासेठों' और रसूखदार भवन स्वामियों का हाथ है, जिन्होंने निजी स्वार्थ के लिए सार्वजनिक सड़कों को ही पार्किंग स्टैंड बना दिया है।
तेलघानी और उसके आसपास के क्षेत्रों में स्थिति सबसे भयावह है। यहाँ गगनचुंबी व्यावसायिक इमारतें तो तन गई हैं, लेकिन उनमें वाहनों को खड़ा करने के लिए एक इंच जगह भी नहीं छोड़ी गई है। आलम यह है कि इन बड़ी-बड़ी इमारतों में आने वाले ग्राहकों और यहाँ काम करने वाले कर्मचारियों के वाहन दिनभर सड़क पर खड़े रहते हैं। सड़क सुरक्षा समिति की बैठकों में यह मुद्दा कई बार गूँजा, लेकिन नतीजा ढाक के तीन पात ही रहा। तत्कालीन यातायात डीएसपी मानवेंद्र सिंह ने इस समस्या को गंभीरता से लेते हुए भवन मालिकों की बैठक बुलाई थी और उन्हें सख्त हिदायत दी थी कि वे अपने परिसरों में पार्किंग की व्यवस्था सुनिश्चित करें। लेकिन प्रशासन की ये हिदायतें इन रसूखदारों की फाइलों में दबकर रह गईं।
बड़ा खेल: तलघरों में पार्किंग की जगह व्यावसायिक संस्थान
नगर पालिका के नियमों के अनुसार, किसी भी व्यावसायिक भवन के निर्माण के समय तलघर (बेसमेंट) को पार्किंग के लिए आरक्षित रखना अनिवार्य होता है। लेकिन गुना के मुख्य बाजारों में खेल कुछ और ही चल रहा है। भवन स्वामियों ने पार्किंग के लिए नक्शे में पास कराए गए तलघरों को ऊंचे किराए पर व्यावसायिक संस्थानों, दुकानों और गोदामों को दे दिया है। इन तलघरों से हर महीने लाखों का किराया वसूला जा रहा है, जबकि उस भवन के कारण सड़क पर लगने वाले जाम की कीमत आम जनता चुका रही है। जिला प्रशासन ने पूर्व में कुछ कड़े कदम उठाते हुए कुछ विवादित तलघरों में ताले भी जड़े थे, लेकिन हर बार 'राजनीतिक दबाव' और 'ऊपर से फोन' आने के कारण कार्रवाई को बीच में ही रोकना पड़ा। यह स्पष्ट है कि जब प्रशासन के हाथ रसूख और राजनीति की जंजीरों से बंधे हों, तो आम नागरिक का हित पीछे छूट जाता है।
बापू पार्क: व्यापारियों का 'स्थाई गैरेज'
सदर बाजार की स्थिति भी कुछ अलग नहीं है। यहाँ पार्किंग के नाम पर एकमात्र सहारा 'बापू पार्क' था, लेकिन अब वह भी अपर्याप्त हो चुका है। हैरानी की बात यह है कि इस सार्वजनिक पार्क का उपयोग अब मुख्य बाजार के व्यापारी अपने वाहनों को स्थाई रूप से खड़ा करने के लिए कर रहे हैं। सुबह से रात तक व्यापारियों की गाड़ियाँ यहाँ खड़ी रहती हैं, जिससे बाजार आने वाले आम ग्राहकों को वाहन खड़ा करने के लिए घंटों भटकना पड़ता है या फिर नो-पार्किंग में गाड़ी खड़ी कर चालान कटवाना पड़ता है।
हवा में 'दो मंजिला पार्किंग' का वादा
जिला प्रशासन पिछले काफी समय से शहर को 'मल्टीलेवल' या 'दो मंजिला' पार्किंग देने का झुनझुना थमा रहा है। कागजों पर तो योजनाएं बहुत आकर्षक लगती हैं, लेकिन धरातल पर अब तक एक ईंट भी नहीं रखी गई है। जब तक यह सरकारी प्रोजेक्ट पूरा होगा, तब तक शहर की आबादी और वाहनों का दबाव इस कदर बढ़ चुका होगा कि यह योजना भी छोटी पड़ने लगेगी।
इच्छाशक्ति की कमी इसलिए पार्किंग नहीं
गुना की इस बदहाल पार्किंग व्यवस्था के पीछे केवल जगह की कमी नहीं, बल्कि प्रशासन की इच्छाशक्ति का अभाव और धनबल का प्रभाव है। जब तक प्रशासन बिना किसी भेदभाव के उन व्यावसायिक इमारतों के तलघरों को खाली कराकर पार्किंग शुरू नहीं कराता, तब तक जयस्तंभ से हनुमान चौराहे की सड़कों को जाम से मुक्ति मिलना असंभव है। क्या जिला प्रशासन इन 'धन्नासेठों' पर शिकंजा कस पाएगा या गुना की जनता इसी तरह जाम के झाम में पिसती रहेगी? यह एक बड़ा सवाल बना हुआ है।