कहीं बिजली नहीं तो कहीं बिल दे रहे झटके गुना में गहराया बिजली का संकट, आम लोगों के साथ ही राजनीतिक दलों का कलेक्ट्रेट में हल्ला बोल

कहीं बिजली नहीं तो कहीं बिल दे रहे झटके  गुना में गहराया बिजली का संकट, आम लोगों के साथ ही राजनीतिक दलों का कलेक्ट्रेट में हल्ला बोल
बिजली की समस्या से परेशान रहवासी कलेक्ट्रेट पहुंचे।

गुना। जिला मुख्यालय पर आयोजित जनसुनवाई और सड़कों पर उतरते विरोध प्रदर्शनों ने मंगलवार को जिले की चरमराई बिजली व्यवस्था की पोल खोलकर रख दी है। एक ओर जहां शहर की नई कॉलोनियां पिछले 5 वर्षों से अंधेरे में रहने को मजबूर हैं, वहीं दूसरी ओर भारी-भरकम बिजली बिलों और स्मार्ट मीटर की अनिवार्यता ने आम जनता की कमर तोड़ दी है। जिले के विभिन्न हिस्सों से आए ये मामले दशार्ते हैं कि बिजली विभाग और उपभोक्ताओं के बीच संवाद और सुविधाओं की कितनी बड़ी खाई पैदा हो गई है। शहर के जानकीपुरम और पुरानी छावनी क्षेत्र की राधे कॉलोनी के रहवासी पिछले पांच वर्षों से बिजली जैसी बुनियादी सुविधा के लिए तरस रहे हैं। मंगलवार को बड़ी संख्या में इन कॉलोनियों के लोग कलेक्ट्रेट पहुंचे और जनसुनवाई में अपनी पीड़ा बताते हुए स्थाई बिजली कनेक्शन मुहैया कराने की गुहार लगाई। रहवासियों का कहना है कि साल 2018 में ये कॉलोनियां अस्तित्व में आई थीं, लेकिन विडंबना यह है कि आज तक यहां बिजली के खंभे तक नहीं लग पाए हैं। स्थाई कनेक्शन न होने के कारण लोग जैसे-तैसे दूर-दराज से अस्थाई तारों के जरिए बिजली खींचने को मजबूर हैं, लेकिन यहां भी उनकी मुश्किलें कम नहीं होतीं। बिजली कंपनी के कर्मचारी अक्सर इन तारों को काटकर ले जाते हैं, जिससे पूरा इलाका अंधेरे में डूब जाता है। पीड़ितों का तर्क है कि वे नियमानुसार कनेक्शन लेने और बिल भरने के लिए पूरी तरह तैयार हैं, लेकिन बिजली कंपनी खंभे न होने का हवाला देकर हाथ खड़े कर रही है। कंपनी की शर्त है कि या तो कॉलोनाइजर खंभे लगवाए या फिर रहवासी स्वयं अपने खर्च पर व्यवस्था करें। कॉलोनाइजर और विभाग की इस खींचतान के बीच आम जनता को "सम्मानजनक जीवन" के अधिकार से वंचित रखा जा रहा है।   

कागजी' मीटर और 80 हजार का झटका

प्रदेशव्यापी आह्वान पर एसयूसीआई कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा 12 से 17 फरवरी तक चलाए जा रहे विरोध प्रदर्शन के अंतिम चरण में बिजली की बढ़ती दरों और निजीकरण के खिलाफ हुंकार भरी गई। इस प्रदर्शन के दौरान बिजली विभाग की एक हास्यास्पद लेकिन दर्दनाक लापरवाही उजागर हुई। ग्राम सोजना से आए ग्रामीणों ने बताया कि उनके गांव में अभी तक बिजली के तार तक नहीं पहुंचे हैं, लेकिन विभाग ने वहां मीटर लगा दिए हैं। यह बिजली कंपनी की कार्यशैली पर गंभीर प्रश्न खड़ा करता है कि बिना बिजली आपूर्ति के मीटर लगाने का क्या औचित्य है। वहीं वार्ड 23 इस्लामिया कॉलोनी की निवासी फरीदा का मामला बिजली विभाग की तानाशाही को दशार्ता है। फरीदा ने बताया कि उनके घर में जबरन स्मार्ट मीटर लगाने का उन्होंने विरोध किया था, जिसके "पुरस्कार" स्वरूप विभाग ने उन्हें 6 महीने का 80 हजार रुपए का बिजली बिल थमा दिया। यह मामला स्पष्ट करता है कि स्मार्ट मीटर की अनिवार्यता और बिलिंग प्रणाली में कितनी बड़ी खामियां हैं, जो आम आदमी को आर्थिक रूप से तबाह कर रही हैं।

बुनियादी सुविधाओं का अभाव और आगामी संघर्ष

एसयूसीआई के इस आंदोलन में बिजली के अलावा साफ पानी की कमी, सरकारी स्कूलों को बंद करने की योजना और अस्पतालों की बदहाली जैसे मुद्दों को भी प्रमुखता से उठाया गया। संगठन का आरोप है कि सरकार सार्वजनिक क्षेत्रों का निजीकरण कर आम जनता को पूंजीपतियों के हवाले करना चाहती है। प्रदर्शनकारियों ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि बिजली बिलों की गड़बड़ी और जनविरोधी नीतियों में सुधार नहीं किया गया, तो आने वाले दिनों में आंदोलन को और उग्र किया जाएगा।