राशन माफिया का खौफनाक खेल : अब गरीबों की थाली में 'प्लास्टिक' का जहर ; कालाबाजारी के बाद अब मिलावट के बड़े घोटाले की आशंका

राशन माफिया का खौफनाक खेल : अब गरीबों की थाली में 'प्लास्टिक' का जहर ;  कालाबाजारी के बाद अब मिलावट के बड़े घोटाले की आशंका
गुना। पकाने के बाद नकली और असली चावल दिखाती महिला।

अनंत न्यूज़ @ गुना। जिले में सरकारी राशन वितरण व्यवस्था एक बार फिर सवालों के घेरे में है। ताजा मामला शहर के नई सड़क स्थित संतोषी माता मंदिर वाली गली से सामने आया है, जहाँ वार्ड नंबर 15 की कंट्रोल दुकान से मिले चावलों में कथित तौर पर 'प्लास्टिक' (फोर्टिफाइड या कृत्रिम) चावलों की मिलावट का सनसनीखेज खुलासा हुआ है। यह मामला सिर्फ एक महिला की शिकायत तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जिले में सक्रिय राशन माफियाओं के एक नए और खतरनाक खेल की ओर इशारा कर रहा है।

क्षेत्र की निवासी लीलाबाई पंत ने जब इस बार कंट्रोल से मिले चावलों को घर पर पकाया, तो उन्हें कुछ अजीब महसूस हुआ। लीलाबाई ने बताया कि उनका परिवार पिछले काफी समय से इन चावलों का सेवन कर रहा था, लेकिन अक्सर सब्जी या हल्दी मिलाकर पकाने के कारण चावलों के रंग और बनावट का असली अंतर छिप जाता था। शनिवार को जब उन्होंने बिना हल्दी के सादे चावल उबाले, तो पतीले का नजारा देख वह दंग रह गईं। असली चावल के दाने तो पूरी तरह पक कर नरम हो चुके थे, लेकिन उनके बीच मौजूद कुछ दाने बिल्कुल अलग और चमकदार दिखाई दे रहे थे। जब लीलाबाई ने उन दानों को हाथ से मसलने की कोशिश की, तो वे पत्थर की तरह सख्त थे और उबलने के बाद भी नहीं टूटे। लीलाबाई का आरोप है कि ये बाजार में मिलने वाले कृत्रिम प्लास्टिक चावल हैं। उन्होंने सवाल उठाया कि "सरकार गरीबों को मुफ्त राशन देने का दावा तो करती है, लेकिन क्या गरीबों की जान इतनी सस्ती है कि उन्हें जहर परोसा जाए?

कालाबाजारी से लेकर मिलावट तक का सफर
गुना जिला लंबे समय से राशन के चावलों की कालाबाजारी के लिए प्रदेश भर में चर्चाओं में रहा है। बीते वर्षों में जिले के विभिन्न हिस्सों से ट्रकों में भरकर ले जाया जा रहा सरकारी चावल कई बार पुलिस और प्रशासन द्वारा पकड़ा गया है। राशन माफिया कंट्रोल के चावल को गरीबों तक पहुँचाने के बजाय उसे ऊंचे दामों पर मिलों और फैक्ट्रियों में खपा देते थे। हाल ही में जब शासन ने नियमों को सख्त किया और कंट्रोल की दुकानों पर वितरण के दौरान चावल की मात्रा का कड़ाई से मिलान शुरू किया, तो कालाबाजारियों ने अपना रास्ता बदल लिया है। जानकारों और स्थानीय लोगों का मानना है कि अब जब असली चावल को बाहर निकालना मुश्किल हो रहा है, तो माफिया ने चावल की कुल मात्रा को बढ़ाने के लिए उसमें सस्ता और हानिकारक कृत्रिम चावल मिलाना शुरू कर दिया है। यह एक सोची-समझी साजिश है, ताकि कागजों पर स्टॉक पूरा दिखे और कीमती असली चावल को बाजार में बेचकर मोटा मुनाफा कमाया जा सके।

क्या फोर्टिफाइड चावल के नाम पर हो रही है धोखाधड़ी?
प्रशासन अक्सर इसे 'फोर्टिफाइड' चावल (पोषण युक्त चावल) बताकर पल्ला झाड़ लेता है, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि असली फोर्टिफाइड चावल पकने के बाद नरम हो जाता है। लीलाबाई के मामले में दानों का न गलना और प्लास्टिक जैसी बनावट एक बड़े घोटाले की ओर संकेत कर रही है। यदि इस मामले की उच्च स्तरीय जांच की जाती है, तो यह जिला स्तर पर एक बड़ा 'राशन मिलावट घोटाला' साबित हो सकता है।

प्रशासनिक चुप्पी और जनता का आक्रोश
इस घटना के बाद से वार्ड नंबर 15 और आसपास के क्षेत्रों में राशन कार्ड धारकों के बीच भारी रोष व्याप्त है। लोगों का कहना है कि खाद्य विभाग के अधिकारी केवल दफ्तरों में बैठकर फाइलों का मिलान करते हैं, जबकि जमीनी स्तर पर गोदामों और कंट्रोल दुकानों पर क्या खेल चल रहा है, इसकी सुध लेने वाला कोई नहीं है। लीलाबाई पंत अब इस मामले की लिखित शिकायत खाद्य विभाग, जिला कलेक्टर और प्रदेश के मुख्यमंत्री तक पहुँचाने की तैयारी कर रही हैं। उनका कहना है कि यह केवल उनके परिवार का मामला नहीं है, बल्कि गुना के हजारों गरीब परिवारों के स्वास्थ्य का सवाल है।

जांच की मांग: खुल सकता है बड़ा राज
स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि अगर प्रशासन ईमानदारी से इन संदिग्ध चावलों के सैंपल लैब में भेजता है और कंट्रोल दुकानों के स्टॉक की सघन जांच करता है, तो कालाबाजारियों के पूरे नेटवर्क का भंडाफोड़ हो सकता है। क्या यह मिलावट गोदाम स्तर पर हो रही है या राशन दुकानदारों की इसमें मिलीभगत है? क्या जिले के राशन माफिया अब मिलावट के जरिए अपनी तिजोरियां भर रहे हैं? इन सभी सवालों के जवाब केवल एक निष्पक्ष और उच्च स्तरीय जांच से ही मिल सकते हैं।